वैश्विक विकास पर दबाव: 2026 में अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियाँ और अवसर

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विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाएँ 2026

संयुक्त राष्ट्र ने गुरुवार को चेतावनी दी कि वर्ष 2026 में वैश्विक आर्थिक ??

विश्व अर्थव्यवस्था 2026 में 2.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर सकती है, जो 2025 के अनुमानित 2.8 प्रतिशत से कम है और महामारी-पूर्व औसत 3.2 प्रतिशत से काफी नीचे है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में उपभोक्ता खर्च, मुद्रास्फीति में कमी और व्यापार वृद्धि के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन कमजोर निवेश और सीमित राजकोषीय क्षमता लंबे समय तक धीमी वृद्धि का जोखिम बढ़ा रहे हैं।

रिपोर्ट को नई दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में प्रस्तुत करते हुए, भारत में संयुक्त राष्ट्र निवासी समन्वयक के कार्यालय के देश अर्थशास्त्री क्रिस गैरोवे ने कहा कि बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी भारत अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है
उन्होंने कहा, “भारत चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल में एक मजबूत केन्द्र के रूप में उभर रहा है। 2026 में सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है, जिसका आधार है मजबूत घरेलू मांग और रणनीतिक निवेश।”
उनके अनुसार प्रभावी नीतियाँ जनसांख्यिकीय लाभ, डिजिटल नेतृत्व और औद्योगिक विविधीकरण को दीर्घकालिक विकास में बदल सकती हैं।

भारत की आर्थिक वृद्धि 2025 के अनुमानित 7.4% से घटकर 2026 में 6.6% रहने का अनुमान है।
मजबूत घरेलू उपभोग, सार्वजनिक निवेश, कर सुधारों का प्रभाव और कम ब्याज दरें आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देंगी। यद्यपि अमेरिका के बढ़े हुए शुल्क भारत के निर्यात पर दबाव डाल सकते हैं, रिपोर्ट के अनुसार कई प्रमुख निर्यात खंड प्रभावित होने से बच सकते हैं, और अन्य बाजारों की मजबूत मांग इन प्रभावों को आंशिक रूप से संतुलित करेगी।

दक्षिण एशिया का व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण भी मजबूत बना हुआ है, जिसका आधार निजी उपभोग और सार्वजनिक निवेश है।
2025 में क्षेत्र में मुद्रास्फीति में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई और अधिकांश देश अपने केंद्रीय बैंक लक्ष्यों के अनुरूप स्तरों पर पहुँचे। औसत उपभोक्ता मुद्रास्फीति 2026 में बढ़कर 8.3% से 8.7% होने का अनुमान है — नेपाल में 3.2%, भारत में 4.1% और इस्लामिक गणराज्य ईरान में 35.4% तक।

रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि पूर्व एवं दक्षिण एशिया में जोखिम नीचे की ओर झुके हुए हैं
व्यापार नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, भले ही कुछ व्यापार समझौते हुए हैं और अमेरिकी शुल्क वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है। चीन, यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मंदी क्षेत्रीय व्यापार, निवेश और पर्यटन पर और दबाव डाल सकती है।

उच्च सार्वजनिक ऋण भी एक प्रमुख जोखिम कारक के रूप में सामने आया है।
दक्षिण एशिया सहित कई अर्थव्यवस्थाओं में नाजुक राजकोषीय स्थिति सरकारों की प्रतिक्रिया क्षमता सीमित कर रही है और वे बाहरी झटकों का प्रभावी ढंग से सामना करने में कठिनाई महसूस कर सकती हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा,
“आर्थिक, भू-राजनीतिक और तकनीकी तनावों का संगम वैश्विक परिदृश्य को बदल रहा है, जिससे नए आर्थिक जोखिम और सामाजिक कमजोरियाँ उभर रही हैं। कई विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ संघर्ष कर रही हैं और इस कारण सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रगति दुनिया के बड़े हिस्से के लिए अब भी दूर है।”

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