प्रेम.... महज़ इत्तेफ़ाक़...
प्रेम कभी उन लोगों को क्यों नहीं मिलता जो भरे हैं प्रेम से
प्रेम सदैव एक रिक्तितता बनकर रह जाता है प्रेम के भूखे लोगो के लिए..
वो ही लोग उपेक्षित हैं जो सबसे ज्यादा हक़दार हैं प्रेम के
वो ..जिन्होंने प्रेम को ईश्वर माना वो सबसे ज्यादा छले गए अपने ईश्वर के हाथों
प्रेम ने ना सिर्फ श्रद्धा का नाश किया
प्रेम अक्सर आवरण में घृणित कर्म लगता है क्रुद्ध प्रेमियों को
पर फिर भी प्रेम अभाव कभी खत्म नहीं कर पाया मनुष्य में से मनुष्यत्व
वे सबसे ज्यादा समर्पित रहे प्रेम के प्रति
यानी घृणा, छल, व उपेक्षा मिलकर भी समाप्त नहीं कर सकते प्रेम की बूंद मात्र को भी..